Friday, October 12, 2018

नायक से--
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।
पकी डाल के कच्चे केलो!

पहले की कुछ बात अलग थी.
मावस वह रात अलग थी।
जानबूझकर क्रान्तिकारियों
सँग जो की वह घात अलग थी।

काँच, शहद में नहीं समेलो।
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।(1)

जिसने तुष्टीकरण को पाला।
रक्तिम बँटवारा कर डाला।
ब्रह्मचर्य मिस इज़्ज़त लूटी,
जपो न उसकी मोहन-माला।

दूध में न तेज़ाब उँडेलो।
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।(2)

जो फकीर बनकर घूमे हैं।
दीवानों जैसे झूमे  हैं।
आज़ादी के लिए जिन्होंने
फाँसी के फन्दे चूमे हैं।

नाम ज़रा उनके भी ले लो।
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।(3)

तुमको राम पुकार रहे हैं।
कटे शीश धिक्कार रहे हैं।
साँपों के बच्चे सेना पर,
अब भी पत्थर मार रहे हैं।

शक्तिमन्त बन तोहमत झेलो।
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।(4)

जनसंख्या पर नहीं नियन्त्रण।
विफल हुए सारे अभियन्त्रण।
षडयन्त्रों की बाढ़ दगी है,
नहीं कर रहे कुछ अभिमन्त्रण।

ध्यान तनिक इन पर भी दे लो।
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।(5)

पीढ़ी पछताने वाली है।
दीवाली जाने वाली है।
'गब्बर' है जिसकी तलाश में,
होली फिर आने वाली है।

बेढंगे पापड़ मत बेलो।
यों 'गाँधी-गाँधी' मत खेलो।(6)
         -आचार्य देवेन्द्र देव (फरीदाबाद प्रवास)

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